Saturday, 28 September 2019

हरिगीतिका छंद

दीया मया के (हरिगीतिका छंद)

दीया मया के बार ले,झन पोंस तैं अँधियार गा।
मन राख झन तैं खोड़ ला,सँग राख ले उजियार गा।
जग जीत गुरतुर बोल ले,जी ले बने तैं हाँस के।
करले रहत ले सत करम, नइहे ठिकाना साँस के।

ये तन भले दिखथे सुघर, माटी हवय तैं जान ले।
दिन एक पाके फर असन,ये गल जही तैं मान ले।
का के गरब अतका करे, नइहे कुछू जब तोर गा।
दिनरात रटथच तैं ह मैं, कइथच सबो ला मोर गा।

राखे हवस तैं जोर के,धन आय नइ कुछ काम गा।
परहित खरच सुख बाँट ले,रइही जगत मा नाम गा।
बनबे सहारा दीन के, होही सहारा राम हा।
तै रेंगबे सत बाट मा, हाँ मिल जही सुखधाम हा।

पाबे खुशी तैं  हेरबे, काँटा ल ककरो पाँव के।
आसीस चढ़ही मूड़ मा, करबे फिकर पर घाव के।
बड़ मीठ फर परमार्थ के, चिख देख ले तैं स्वाद गा।
दिन चार ये जिनगी हवय,झन कर समे बरबाद गा।

              मनीराम साहू 'मितान'
              कचलोन, सिमगा
              जिला- बलौदाबाजार छत्तीसगढ़