ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन
212 212 212 212
घर रहय छोट चमकत दुवारी रहय।
सोचथँव मोर सुग्घर सुवारी रहय।1।
ऊँच सुग्घर रहय झन रहय ठेमनी,
थोक गोरी रहय थोक कारी रहय।2।
वो मयारू रहय झन रिसावय कभू,
हाँ मुँहू झन चिटिक सोज गारी रहय।3।
मैं हा सकहूँ कहाँ वो हा बघनिन रही,
वो बिना सींग के गउ बिचारी रहय।4।
गोठियावय सुघर मुसकियावत सदा,
बात ओकर कभू झन लबारी रहय।5।
साग राँधय बने भात राँधय बने,
मोर दाई ददा के दुलारी रहय।6।
झन सतावय कभू सोन गहना बिसा,
लेके लुगरा करे झन उधारी रहय।7।
जाहूँ मइके कहत झन पदोवय बही,
खूब बोले के झनजी बिमारी रहय।8।
जाँव ससुरार होवय ठिठोली घलो,
एक सारा रहय एक सारी रहय।9।
डार दय जेब मा नोट बड़का असन,
सास धरमीन दानी ग नारी रहय।10।
सोच के डर बहुत मोला लगथे मितान,
झन ससुर मोर दरुहा जुवारी रहय।11।
- मनीराम साहू 'मितान'