Tuesday, 25 April 2023

हिन्दी प्रतीक दोहे

हिन्दी दोहे
1
सारे मूषक सामने, प्रश्न खड़ा है मौन।
घंटी बिल्ली के गले, बाँधे आखिर कौन।
2
निनानबे के फेर में, भटक गया है बाट।
हुआ नही घर का कभी, छूट गया अब घाट।
 3
तिमिर पनप जाये भले , पा जाये विस्तार।
पर उसमें है दम कहाँ, सह ले दीप प्रहार।
4
कौरव सभी दबंग हैं, घात करे दिन रात।
दुर्योधन के राज में, कहाँ न्याय की बात।
5
किया चकित श्रीमान का, अटपट यह व्यवहार।
चींटी चट गुड़ कर रहीं, रहे टोकरी मार।
6
दु:शासन है हर जगह, शहर शहर अरु गाँव।
चीरहरण का दृश्य अब, दिखता है हर ठाँव।
7
किया मलिन फिर भेक ने, लगा गर्द निज अंग।
सोये जो नित कीच में, भाये कहाँ पलंग।
8
अपनी रोटी सेंकने, जता रहा है खेद।
कुटिल कलूटा काग को, रँगते रंग सफेद।
9
भय से व्याकुल श्वान को, बुला रहा है शेर।
कहता आखिर कौन है, खट्टा अपना बेर।
10
भाग गया जब साँप तब, पीटा खूब लकीर।
बैठा अब है रो रहा, कोस रहा तकदीर।
11
सहज अवक्री रुक्ष में,चलता झट हथियार।
रहता खुश कान्तार में, वक्री काँटेदार।
12
मुख भी है अब देखता, अपना ही बस स्वाद।
खाकर ऊल जलूल तन, कर देता बरबाद।
13
लौह नली रख लो भले, श्वान पूँछ कुछ माह।
पूर्ण नही होगी कभी, करने सीधी चाह।
14
नागचंद अरु व्यालसिंह, मझ है खासा बैर।
लाभ कमाने में दिखे, मिलकर करते सैर।
15
समय बली जब रुष्ट हो, करता उलट बयार
पिपली से भी युद्ध में, जाता है गज हार।
16
और अधिक की चाह में, चलकर तिरछी चाल।
मार गया श्रीमान जी, थप्पड़ अपनी गाल।
17
रहता है बस हाँकते, खूब बघारे शान।
हुआ शेर से सामना, छोड़ गया मैदान।
18
सरोकार जन से नही, नहीं भूमि से प्यार।
करने को निज जेब हित, करता है व्यापार।
19
रहा विचरता वर्ष भर, लेकर माथ प्रमाद।
आयी वर्षा काल में, गेह बनाना याद।
20
नही बहाता स्वेद कण, वाक युद्ध का वीर।
मुख में ही लेता बना, लड्डू पेड़ा खीर।
21
तेल न देखा छू कभी, और न उसकी धार।
निकल गया है युद्ध को, बिना रखे हथियार।
22
पता नही हो जाय क्या, जंगल में इस बार।
बंदर को है मिल गया, देखो जी तलवार।
23
देख रहा आकाश को, होकर डावा-डोल।
गाँठ सोंठ इक क्या मिला, बदल गये हैं बोल।
24
भले भयानक लग रही, अभी अमावस रात।
रस्ता रवि का रोक ले, इसकी क्या औकात।
25
सर से लेकर पाँव तक, सना हुआ जो कीच।
कहता पालें स्वच्छता, जाकर के जन बीच।
26
किया न पूजा-पाठ अरु, दान भजन उपवास
फलाहार को सामने, बैठा राघव दास।
27
बोला गर्दभ श्वान से, भाई तू ही भौंक।
दंड भुगतने रेक कर, नही मुझे है शौक।
28
दर्प वक्ष में वास कर, करता जब आघात।
तेज दौड़कर भी शशक, खा जाता है मात।
29
चलता कच्छप चाल में, संग रखे जो धीर।
मिलता उसको एक दिन, मेवा मिश्री खीर।
30
आयेगा सच जान लो, घुर के दिन भी लौट।
बढ़ता पय का स्वाद भी, जाता जब तप औंट।
31
बढ़ा हाट में दाम का, जब से अधिक रसूख।
कड़वे अति लगने लगे, कदली दाड़िम ऊख।
32
सहे भूख अरु प्यास को, जुते धूप में बैल।
मजा चने का ले रहे, हैं घोड़े बिगड़ैल।
33
कर ली रवि से मित्रता, हुआ मेघ दुर्दान्त।
जीरा खाकर ऊँट अब, करे क्षुधा को शान्त।
34
कोड़े दे उपहार में, किया पीठ जो लाल।
रोने को है आ गया, बनकर के घड़ियाल।
35
मिश्री गुड़ से है सनी, दाड़िमप्रिय की बात।
रखता है जो पेट में, और बहुत से दाँत।
36
मरा मांस भक्षण करे, चलकर टेढ़ी चाल।
दाँव पेच आखेट का, जाने क्या श्रृंगाल।
37
देख रहा था नेवला, उचक रहा है व्याल।
मिला खेत के मेड़ में, चर्बी दिया निकाल।
38
काम न आयी धूर्तता, फँसी जाल जब आप।
जीभ चबा कर लोमड़ी, बैठ गयी चुपचाप।
39
पाँच वर्ष पश्चात अब, दिखलाने कुछ रंग।
चला मदारी गाँव को, बंदर भालू संग।
40
हिंसा से कर मित्रता, कुछ पशु प्रेम दरिद्र।
खातें है जिस थाल में, करते उसमे छिद्र।
41
था अपने को मानता, ज्ञानी ध्यानी सिद्ध।
बीस पड़े जब हंस जी, किया पलायन गिद्ध।
42
धौंस जमाने मार्जरी, घुमी शान से प्रांत।
त्रास हृदय में क्यों रखे, कोतवाल जब कांत।
43
मालदार माली हुआ, बेच बेच कर फूल।
देखभाल जल सींचना,गया सभी अब भूल।
44
अपने पत्ते भ्रात से, कहा विवेकी फूल।
माली के उपकार को, जाना मत तुम भूल।
45
जान गँवा ली क्या हुआ, बकरी खायी मात।
टक्कर देना गुर्ग को, नही सहज है बात।
46
काटा मीठा जानकर, खींचा उसका मूल।
खूब सताया ईख को, कंटकदार बबूल।
47
किया खूब उत्पात घर, नोंचा सर के बाल।
मर्कट से कर मित्रता, पछताये तरु डाल।
48
नागिन‌ को घर में रखे, बना वधू की सौत।
होने को है जान लो, जल्दी उसकी मौत।
49
हिम्मत देखो मीन की, रही निडर हो तैर।
लोकतंत्र के ताल मे, पाल मगर से बैर।
50
शाखामृग सिंह का बना, जब से मक्खन बाज।
निर्धनता घर से गयी, सँवर रहे सब काज।
51
लुटते देखे लाज को, बनकर जिंदा लाश।
ऐसे ज्ञानी भीष्म का, होता है तब नाश।
52
नार भ्रूण है कोख में, जाना मूढ़ भुजंग।
किया खून निज खून का, पापी दुष्ट मलंग।
53
कहे टमाटर मिर्च से, क्यों लेना तन दाग।
बनना सब्जी है हमें, पकना है जब आग।
54
चाहे जो भी पर्व हो, होवे खास प्रयास।
चिड़ियों के घर भी दिखे, हर्ष उमंग उजास।
55
सर रख द्युति के तेज को, सहता कष्ट अपार।
दे पाता है खंभ तब, खुशियों का संसार।
56
हँसिया बैठा रो रहा, हो पेशे से हीन।
हार्वेस्टर सरदार बन, लिया जीविका छीन।
57
ले मशाल अब हाथ में, फैला रही प्रकाश।
यान उड़ाती गिलहरी, विचर रही आकाश।
58
ऋक्ष बघेरा तेदुआ, चीता बाघ सियार।
मार विपिन मृग कोटरी, मना रहे त्यौहार।
59
बढ़ते आगे देखकर, भटकाने को बाट।
रहे भौंकते श्वान सब, पहुँच गया गज हाट।
60
मारुत से कर मित्रता, तम ने किया प्रयास।
बुझा न पाये दीप को, रही अधूरी आस।
61
बैठ बगल देकर हवा, भड़काये जो आग।
जलकर उसकी देह में, बनना तय है दाग।
62
दया प्रेम है उर बसा, नहीं तनिक अभिमान।
चेला सच्चा हंस का, है सद्ज्ञान खदान।
63
पांच वर्ष बस बोलते, रहा खूब चढ़ मंच
चुना गया गिरगिट पुनः, बाड़ी का सरपंच।
64
अनुपस्थिति में सूर्य की, देता तम को मात।
भले न उसके सामने, दीपक की औकात ।
65
बरगद भले विशाल है, है भी जग में खास।
पर उगने देता नहीं, नीचे अपने घास।
66
सिलकन टेरीकाट को, दिखा भले अपनत्व।
पर खादी का है सखा, अपना अलग महत्व।
67
सुन्दर अति है दिख रहा, मोह रहा जो फूल।
उसको भी तो सूख कर, मिलना है जा धूल।
68
रंग बिरंगे फूल जब, जाते हैं मिल बंध।
बनकर हार बिखेरते, सबसे अलग सुगंध।
69
गंगा जाना लक्ष्य है, करने पावन स्नान।
कार बैठ कुछ हैं चले, कुछ जन रेल विमान।
70
भोली चिड़ियाँ पा दगा, फँसी रहीं कुछ देर।
दिखलायीं जब एकता, हुआ शिकारी ढेर।
71
नदिया अगम अथाह है, तेज अधिक भी धार।
टूटा नाव सवार हो, होगा कैसे पार।
72
मीठी मीठी बात में, हो प्रसन्न आ पास। 
पलक झपकते बन गया, मेढक बगुला ग्रास।
73
करने को उसकी भला, कुछ भी करो निशंक।
नही छोड़ता मारना, बिच्छू अपना डंक।
74
मारा पत्थर कीच में, कहलाने को वीर।
पछताया श्रीमान जब, चिपका छिटक शरीर।
75
रुपिया पैसा खर्च कर, करले कोशिश लाख।
यह तो प्यारी नींद है, आती है निज आँख।
76
तय है उसका डूबना, जा करके मझधार।
जो दो नइया पैर रख, होना चाहे पार।
77
मिलकर सारे घुरघुरे, बजा रहे हैं बीन।
खुश करना है नाग को, है जो सत्तासीन
78
अति व्याकुल है लग रहा, देखो मायादास।
बैठ उदधि के सामने, बुझा न पाया प्यास।
79
है अधिकृत जो काम को, कार्यालय श्रीराय।
काम तभी करता सही, मिलती उसको चाय।
80
भले ज्ञान में अग्र हैं, मैना हंस मयूर।
पर कागा के सामने, हैं झुकने मजबूर।
81
सभी पुजारी स्वार्थ के, खग विकास को पाल।
काट काट कर सब हरा, बढ़ा रहे हैं लाल।
82
ऊँचे में जो भी रहे, सहता है सब भार।
वर्षा पाला जाड़ या, धूप हवा की मार।
83
जिसको रौंदा जा रहा, कीच जानकर पैर।
धूप पवन पा देखना, गगन करेगा सैर।
84
मेढक सब टर्रा रहे, नाच रहे हैं मोर।
आने को बरसात है, मचा रहे हैं शोर।
85
तालमेल रख साथ में, करते हैं जब काम।
कपड़े सिल धागा सुई, करते रोशन नाम।
86
खोता अपने स्वास्थ्य को, होता हीन चरित्र।
जो भी लेता है बना, विष प्याले को मित्र। 
87
दाढ़ी में है रक्त का, धब्बा छोटा एक।
लगता ज्यादा है नही, नीयत सिंह की नेक।
88
लिया ऊँट था रेत में, अपना झंडा गाड़।
टूटा सारा दर्प जब, चढ़ने गया पहाड़।
89
बोरा कद में है बड़ा, बड़ा जगत में नाम।
पर कर सकता है नही, लघु थैले का काम।
90
छेने अंतस जब समा, जाता शक्कर घोल।
मिलता उसको मान अरु, बढ़ता उसका मोल।
91
पंकज नीरज पद्म अरु, उत्पल कंज सरोज। 
फूल कमल के नाम हैं, करो न गंगू भोज।
92
सड़ा प्याज रह टोकरी, करता है जब बास।
औरों को देता सड़ा, रहते हैं जो पास।
93
लगता थोथा है चना, बजा रहा है गाल
बजता भी तो है अधिक, बिना साज सुर ताल।
94
एक दूसरे का ध्वजा, चिमटा दंड उखाड़।
जोगी जोगी लड़ रहे, मठ को रहे उजाड़।
95
घूमे जो पक्की सड़क, करे शहर से प्यार।
पगडंडी डग का मजा, जाने क्या वह कार।
96
हवा विषैली पश्चिमी, की है ऐसी घात।
पेंट नही है मानता, अब धोती की बात।
97
दे लालच कर छल कपट, लेकर साथ सियार।
बना हुआ है भेड़िया, भेंड़ो का सरदार।
98
कुल्हाड़ी निज साथ में, बिना लिए तरु भ्रात।
काट जाय इक डाल को, नही तनिक औकात।
99
चूस लिया मकरंद को, फँसा प्रेम की जाल।
समझ नही पायी कुसुम, सठ भौंंरे की चाल।
100 
कृषि क्षति के अपराध में, हो आया जो जेल।
रखवाली अब कर रहा, बैला बिना नकेल।
101
थे चौमासे के लिए, सारे रखे अनाज।
ढूंढ ढूंढ कर खा गये, चूहे धोखेबाज।
-मनीराम साहू 'मितान'