Sunday, 22 October 2017

जप लव संगी

बरवै छंद

जप लव संगी जम्मो, प्रभु श्री राम।
पार लगइया पावन, ओकर नाम।

महिमा हवय नाम के, अपरम्पार।
पबरित अढ़ई आखर, देथे तार।

जपे रहिस शबरी हा,निसदिन राम।
पाय रहिस सुग्घर वो, प्रभु के धाम।

केंवट राखिस हिरदे,प्रभु बइठार।
बनिस सिया पतिओकर, खेवनहार।

तरगे रहिस विभीषण,करके जाप।
कटे रहिस रावन के,जम्मो पाप।

तरिस घलो ले वाल्मिकि, उल्टा नाम।
मरा मरा करके वो, पाइस राम।

लहू दान

कज्जल छंद

करले संगी लहू दान।
मिलही नँगते पुन्य जान।
अबड़े होही तोर मान।
बात मान गा तैं मितान।

मन मा बइठे डर निकाल।
भरम रोग झन पोस पाल।
नइ बिगड़य गा तोर हाल।
लगय नही अउ देख भाल।

थोकन तो ले तैं बिचार।
हिरदे ला गा अपन झार।
साफ रही तन लहू धार।
परच नही तैं झट बिमार

झन बतिया गा तीन पाँच।
सच काहत हँव बात जाँच।
जाही ककरो जीव बाँच।
नइ आवय तन चिटिक आँच।
       मनीराम साहू 'मितान'