सार छंद- मनीराम साहू मितान
सुनव सुनव जी सबो किसनहा, बइठव झन बन भैरा।
धनहा डोली खेतखार मा, बारव झन जी पैरा।
धुँगिया होथे फरी हवा मा, परदूषन हा बढ़थे।
एकर सेती भुँई ताव के, पारा हा बड़ चढ़थे।
संग साँस के तन मा जाथे, घात नँगत के करथे।
एती बर सब जीव जन्तु मन, फोकट फोकट मरथे।
जब सकेल के एला भइया, रखहू लेग बियारा।
भँइसा बइला गरू गाय के, बनही सुग्घर चारा।
किंजरत रइथें एमन भइया, एती ओती देखव।
मर जाथें जी बिन चारा के, इन ला चिटिक सरेखव।
बाँधव घर मा सब झन पोंसव, चारा देव बरोबर।
सब ला मिलही दूध दही घी, खातू बर जी गोबर।
काम धरम के हावय एहा, करतब हे सब झन के।
सफल बनालव जिनगी ला जी, साँस मिले हे गन के।
- मनीराम साहू 'मितान'
मजा उड़ाबो(सार छंद)
सुखवा दुखवा चैतू बुद्धू , चलव चलावत गड्डी।
तरिया जाबो डुबक नहाबो, धर लव कुरता चड्डी।
उथली-उथली खेल छुवउला, करबो मिलके मस्ती।
अबड़ मिठाथे हवय पार मा, खाबो पिकरी गस्ती।
झुलबो जी हम बर्रइया मा, निहल-निहल हे डारा।
कुदबो चभरँग ले पानी मा, पारी पारी झारा।
नँगत खोखमा तरिया पैठू , हेर-हेर के खाबो।
हवय पार मा डुमर घलो जी, खाबो मजा उड़ाबो।
मनीराम साहू 'मितान'
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