Wednesday, 24 November 2021

सुरता आही गांव( दोहा गीत)

सुरता आही गाँव

जब सिरमिट कंक्रीट मा, जरही नँगते पाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

मालिक बन हावस इहाँ, उहाँ रबे बनिहार।
सदा तुतारी झेलबे, खाबे गारी मार।
सरू जान जब फाँसहीं, चलहीं उल्टा दाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

मोटर गाड़ी के धुआँ, करही बड़ परसान।
खटपिट खटपिट शोर मा, होबे तैं हलकान।
जब मनखे के भीड़ मा, गँवा जही खुद नाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

पाबे कहँ भाजी चना, कजरा अउ बोहार।
आये अलकर बेर बर, तिंवरा जिल्लो दार।
जब खरचा मन बाढ़ के, करहीं खाँवे खाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

कका बबा मिलहीं कहाँ, मिलही कहाँ मितान।
सदा तरसबे प्रेम बर, रहिबे बन अनजान।
पाबे नही दुलार जब, दाई अँचरा छाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

- मनीराम साहू 'मितान'

Friday, 15 January 2021

सोचथँव(गजल)

ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन 
212 212 212 212

घर रहय छोट चमकत दुवारी रहय।
सोचथँव मोर सुग्घर सुवारी रहय।1।

ऊँच सुग्घर रहय झन रहय ठेमनी,
थोक गोरी रहय थोक कारी रहय।2।

वो मयारू रहय झन रिसावय कभू,
हाँ मुँहू झन चिटिक सोज गारी रहय।3।

मैं हा सकहूँ कहाँ वो हा बघनिन रही,
वो बिना सींग के गउ बिचारी रहय।4।

गोठियावय सुघर मुसकियावत सदा,
बात ओकर कभू झन लबारी रहय।5।

साग राँधय बने भात राँधय बने,
मोर दाई ददा के दुलारी रहय।6।

झन‌ सतावय कभू सोन‌ गहना बिसा,
लेके लुगरा करे झन उधारी रहय।7।

जाहूँ मइके कहत झन‌ पदोवय बही,
खूब बोले के झन‌जी बिमारी रहय।8।

जाँव‌ ससुरार होवय ठिठोली घलो,
एक सारा रहय एक सारी रहय।9।

डार दय जेब मा नोट बड़का असन,
सास धरमीन दानी ग नारी रहय।10।

सोच के डर बहुत मोला लगथे मितान,
झन‌ ससुर मोर दरुहा जुवारी रहय।11।

- मनीराम साहू 'मितान'