Wednesday, 24 November 2021

सुरता आही गांव( दोहा गीत)

सुरता आही गाँव

जब सिरमिट कंक्रीट मा, जरही नँगते पाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

मालिक बन हावस इहाँ, उहाँ रबे बनिहार।
सदा तुतारी झेलबे, खाबे गारी मार।
सरू जान जब फाँसहीं, चलहीं उल्टा दाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

मोटर गाड़ी के धुआँ, करही बड़ परसान।
खटपिट खटपिट शोर मा, होबे तैं हलकान।
जब मनखे के भीड़ मा, गँवा जही खुद नाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

पाबे कहँ भाजी चना, कजरा अउ बोहार।
आये अलकर बेर बर, तिंवरा जिल्लो दार।
जब खरचा मन बाढ़ के, करहीं खाँवे खाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

कका बबा मिलहीं कहाँ, मिलही कहाँ मितान।
सदा तरसबे प्रेम बर, रहिबे बन अनजान।
पाबे नही दुलार जब, दाई अँचरा छाँव।
तरिया नरवा ढोंड़गा, सुरता आही गाँव।

- मनीराम साहू 'मितान'

No comments:

Post a Comment