शंकर छंद (ऊदा-बादी)
काट-काट के जंगल झाड़ी, पारे गा उजार।
ठँव-ठँव मा तैं चिमनी ताने, परिया खेत खार।
धुँगिया-धुँगिया चारों कोती, बगरे शहर गाँव।
खाँसी-खोखी खस्सू-खजरी, सँचरगे तन घाव
पाटे नरवा तरिया डबरा, देये नदी बाँध।
खोज-खोज के चिरई-चिरगुन, खाये सबो राँध।
बघवा भलुवा मन छेंवागे, देये तहीं मार।
जल के जम्मो जीव नँदागे, नइहे तीर तार।
कोड़-कोड़ के डोंगर-पहरी, बनाये मैदान।
होवत-हावय रोज धमाका, खूब खने खदान।
भरभर-भरभर मोटर गाड़ी, घिघर-घारर शोर।
तोरे झिल्ली पन्नी जग मा, देइस जहर घोर।
छेदे छिन छिन छाती धरती, छेद डरे अगास।
खेती खाती डार रसायन, माटी करे नास।
मनमाने मोबाइल टावर, ठँव-ठँव करे ठाढ़।
आनी बानी तोर यंत्र हे, गेइन सबो बाढ़।
सिरतो मैं हा काहत हाबव, बने सुन दे कान।
जिनगी जीबे हली-भली गा, कहे मोरे मान।
रोक रोक अब ऊदा-बादी, होगे सरी नास
रूरत हे तन देखत देखत, थमहत हवय साँस।
- मनीराम साहू 'मितान'
*जब-जब आथे तीजा-पोरा*
जब-जब आथे तीजा-पोरा, सब सुख-चैन हरइया जी।।
सिरतो देथँव कठिन परीक्षा, मात जथे करलइया जी।
नइ देखा पावँव कोनों ला, अपन नींद के ढचरा ला।
उठथँव बिहना ले झखमारी, करथँव गोबर-कचरा ला।
दे बर लगथे पैरा-पानी, बइला बछरू गइया जी।
सिरतो देथँव कठिन परीक्षा, मात जथे करलइया जी।
संझा-बिहना थारी-लोटा, हँड़िया माँजत रइथँव मैं।
जमे कराही नँगत केरवछ, आँखी आँजत रइथँव मैं।
नचवाथें बहिरी खरहेरा, मोला थइया-थइया जी।
सिरतो देथँव कठिन परीक्षा, मात जथे करलइया जी।
छेना-लकड़ी सितहा-सितहा, बरय नहीं चुलहा आगी।
काँख-काँख के फूँकत रइथँव, छुटथे कनिहा के पागी।
खाथँव सिट्ठा चिबरी जस मैं, निचट मेड़वा सँइया जी।
सिरतो देथँव कठिन परीक्षा, मात जथे करलइया जी।
सरी बुता जब घर के होथे, जाथँव डोली कोती मैं।
अकड़ा मा नइ बुता सकावय, रोथँव बइठे ओती मैं।
कहाँ समझथव मोर दुक्ख ला, हाबव सबो हँसइया जी।
सिरतो देथँव कठिन परीक्षा, मात जथे करलइया जी।
महीं मनुज ताना देवइया, नइ पथरा फोड़त हस तैं।
घरू बुता सब रथे हरू कस, खन्ती नइ कोड़त हस तैं।
पर खुद मरे सरग हा दिखथे, हे सच कहे कहइया जी।
सिरतो देथँव कठिन परीक्षा, मात जथे करलइया जी।
- मनीराम साहू 'मितान'
@चल भाई अब फाँद बियासी@
झुर असाड़ दुब्बर के सेती,
रुरगे रहिस किसानी हा
चल भाई अब फाँद बियासी,
बरसे हाबय पानी हा।
रहिस पियासे धरती दाई,
अमरित जल ला पागे गा।
राज दनगरा करत रहिस हे,
ओकर राज छिनागे गा।
खोले हाबय छाबे अवना
सिरतो सावन दानी हा।
चल भाई अब फाँद बियासी,
बरसे हाबय पानी हा।
हाँसत कुलकत देखत हाबय,
हरियागे मुह खेती के।
हमर बाँह के रखे भरोसा,
छोड़ आसरा सेती के।
बाट गढ़त हे बढ़वारी के,
आके बरखा रानी हा।
चल भाई अब फाँद बियासी,
बरसे हाबय पानी हा।
ठलहा हा अब रइही ठलहा,
अड़ियाही गा जाँगर हा।
खलबिल-खलबिल हरिया-हरिया,
चलही मिहनत नाँगर हा।
स्वाद देय बर नेत धरे हे,
अब अथान के चानी हा।
चल भाई अब फाँद बियासी,
बरसे हाबय पानी हा।
- मनीराम साहू 'मितान'
*मैं हरियर रुखराई अँव* (लावनी गीत)
ददा कहू ता ददा हरँव मैं, दाई कहिलव दाई अँव।
नता जोरलव गा मोरो ले, मैं हरियर रुखराई अँव।
एती ओती अन्ते भागत,
लाथँव बादर पानी ला।
अन्न उपजथे मोर करम ले,
करथँव तुँहर किसानी ला।
भला चहइया सबो जीव के, गजब मयारू माई अँव।
नता जोरलव गा मोरो ले, मैं हरियर रुखराई अँव।
बना तुँहर बर घर कुरिया ला,
लाथँव धर खुशहाली ला।
फूल पान फर गुरतुर गुरतुर,
देथँव तक मैं छाली ला।
तुँहर देह के रोग भगइया, जब्बर बुटी दवाई अँव।
नता जोरलव गा मोरो ले, मैं हरियर रुखराई अँव।
देथँव पवन फरी कर तुँहला
पीके धुँगिया बिखहर ला।
झन बोहावय माटी कहिके,
करथँव लाम अपन जर ला।
सज जाथँव अँगना मा सबके, भुइयाँ के सुघराई अँव।
नता जोरलव गा मोरो ले, मैं हरियर रुखराई अँव।
पर गुनथँव मैं अबड़ रात दिन
काबर नित दुबरावत हँव।
जइसे पावत घाम जेठ के,
तरिया असन अँटावत हँव।
काबर पीरा पाथँव जब मैं, दुक्ख हरइया भाई अँव।
नता जोरलव गा मोरो ले, मैं हरियर रुखराई अँव।
- मनीराम साहू 'मितान'
No comments:
Post a Comment