जलहरण घनाक्षरी
करिया बदरा
1
करिया तैं बदरा गा, चुहे बड़ खपरा गा, बरसे तैं सरलुग, अब थोक जा अँतर।
लहुटे नइहे छानी, जात हे भीतर पानी, बेंदरा कुदे हे बड़, हवै जतर-खतर।
जाना जाना तैं हा जाना, दूर देश तैं हा जाना, देखाबे तैं उही कोती, अपन बने गतर।
धनी गये परदेश, कहि देबे जा संदेश, आगे हे किसानी दिन, शुरु होही गा बतर।
2
पैरा नइ धराय हे,भूँसा नइ तोपाय हे, छेना लकड़ी भिँजे के, हवै मोला बड़ डर।
नइहे गा झिपारी हा, मातगे हे ओसारी हा, होवथे गा चोरो-बोरो, कुरिया अँगना घर।
भिथिया हा गिर जाही, कोन एला बनवाही, उड़ उड़ जात हवै, लगे कोठा के खदर।
संसो हवै भारी मोला, जल्दी बलाय हे तोला, कहिबे जोड़ी ला मोर, जा तैं लकर -धकर।
3
घुरवा नइहे माटी, होही चिखला मुहाटी, परे हे पलानी हर, गोंटी काड़ी जाही सर।
खातू नइ बिछाय हे, मुँही नइ बँधाय हे, काँद दुबी लगही गा, अड़बड़ छोले बर।
बिजहा नइहे दाना, परही गा खोज लाना, खातू घलो बिसाही वो, झट करके बतर।
पिया मोरे परदेशी, बने हावै तोरे सेती, भारी तरसाय रहे, तैं गा पीछू के बछर।
-मनीराम साहू 'मितान'
मनहरन घनाक्षरी (बियासी)
फाँदे हावै गा बियासी, भैया मोर खाके बासी,
अर्र-तता कहि कहि, बैला ला रेंगाय जी।
समे वो उपरहा ले, उठे हे मुँधरहा ले,
बैला लाल करिया ला, भूँसा हे खवाय जी।
हाथ धरे हे तुतारी, महिनत के पुजारी,
झट मारै हरिया ला, पाग बने पाय जी।
सँउकरहे हो जाही, काली बाहरा फँदाही,
लकर धकर करै, नइ सुरताय जी।
-मनीराम साहू 'मितान'
मनहरन घनाक्षरी (मोबाइल)
1.
नोहे लेये गा उधारी, मिले हवै सरकारी,
मोबाइल हाथ धरे, भौजी मुसकात हे।
आनी बानी रिंग टोन, बजथे गा आथे फोन,
घेरी बेरी मइके मा, बड़ बतियात हे।
वाटसेप फेसबुक, चलावथे रुक रुक,
भेजथे सँदेशा बड़, सबो ला बतात हे
उही मा धियान हवै, भैया परेशान हवै,
साग ला पचर्रा कभू, सिट्ठा कभू खात हे।
2.
आय नही नेट कभू ,होय नही चेट कभू,
नाचे खोर अँगना मा, बड़ खिसियाय जी।
छानी तको चढ़ जाय, तभो नइ नेट पाय,
होय जाय तालाबेली , बड़ खखवाय जी।
रोघा बेर्रा आनी बानी, गारी देथे पीके पानी,
टावर लगइया के, मुरदा रेंगाय जी।
फोकटे रिसाय जथे ,मुँहू ओथराय रथे,
कहे काँही भैया तहाँ, झगरा मताय जी।
- मनीराम साहू मितान
छत्तीसगढ़
बन झाड़ी रुख राई, डोंगरी पहाड़ी खाई,
जेकर छत्तीसगढ़, पबरित नाम हे।
बसे जिहाँ बमलाई, सिद्धी देवी महामाई,
भंडार गिरौदपुरी, बाबा जी के धाम हे।
रहै जिहाँ संत ज्ञानी, गुँजय कबीर बानी,
दामाखेड़ा नगरी मा, नित सुबे शाम हे।
चलै जेन सत्य पथ, भाँटो राजा दसरथ,
कौशिल्या हमर दीदी, भाँचा सीरी राम हे।
धान के कटोरा सही, लछमी के कोरा सही,
अन धन भरपूर, सीघ गा भंडार हे।
हीरा के हे जुगजुग, बिजली के बुगबुग,
कोठी लोहा कोइला मा, भरे भरमार हे।
शिवनाथ कलकल, इन्द्रावती छलछल,
अरपा पैरी खारुन, महानदी कछार हे।
मोर पुरखा के माटी, चंदन हरच खाँटी,
डंडासरन पैलगी, तोला बारम्बार हे।
श्री राम
राजा दसरथ लाला, साँवर साँवर काला,
कौशल्या दीदी के प्यारा, भाँचा मोर राम हे।
पुरुष वो अँवतारी, साहसी धनुरधारी,
अवध पुरी दुलारा, भाँचा मोर राम हे।
भरत लखन भाई, ऋषि मुनि के सहाई,
कैकेयी आँखी के तारा, भाँचा मोर राम हे।
मूरत वो मरियादा, सत् मा रेंगइया सादा,
जग मा सदा ले न्यारा, भाँचा मोर राम हे।
गंगा के तीरे मा जाके, गोड़ के धुर्रा धोवाके,
लिखे हे निषाद गुहा, केंवट के भाग ला।
पापी जन मारे हावै, सिरतो वो तारे हावै
धोये हावै रघुराई, अहिल्या के दाग ला।
जूठा बेर खाये हावै, शबरी ला भाये हावै,
गाये हे अवधपति, समता के राग ला।
मया गुन गाये खाती, जग ला बताये खाती,
सुग्रीव ले जोरे हरि, मितानी के लाग ला।
गणतंत्र
आवव गा सँगवारी, बल्लू बुधू इतवारी,
मिलके मनाबो हम, झंडा के तिहार ला
बड़े बड़े गुनी ज्ञानी, देहें प्रान बलिदानी,
सोरियाबोन उँकर, करे उपकार ला।
देश ला बँचाये हावैं, गणतंत्र लाये हवैं,
खाये हावैं बीर मन, लाठी गोली मार ला।
सत्य बाट जाबो हमू, मूँड़ ला कटाबो हमू,
लेबो संगी जुरमिल, रखवारी भार ला।
छेरछेरा
छेरछेरा छेरछेरा, हेरहेरा हेरहेरा, पारा पारा गली गली, भारी चिचियात हें।
माँगत हें अन्न दान, मिल लइका सियान, खेवन- खेवन देखौ, खंझा खंझा आत हें।
दोरदिर-दोरदिर, कोरकिर-कोरकिर, रेंगत हें एती ओती, भारी उम्हियात हें।
माँ शाकम्भरी बार मा, अन्न दान तिहार मा, मया प्रेम भाईचारा, मिल बगरात हें।
औंधी
आना आना औंधी खाले, बने भितरौंधी खाले, हरय गा राहेर के, बने उसनाय हे।
तैं खाले भाई झट ले, हे दाना बटबट ले, नइये तोइँया एक्को, बनेच पोक्खाय हे।
थोरके हे चुरपुर, नुनछुर नुनछुर, चोग्गर चोग्गर स्वाद, अभिच्चे जुड़ाय हे।
जाके दाई भर्री खार, बड़े बड़े ला निमार, बाँध बड़े मोटरा मा, टोर जोर लाय हे।
सत के पुजैया गुरु
सत के पुजैया गुरु, सूते के जगैया गुरु, करे भेद भिथिया के, तहीं हा उजार गा।
मरहा के सँगवारी, मुरहा के हितकारी, समता के दीया बारे, मेंटे अँधियार गा।
मनुषता मान करे, अहिंसा के गान करे, जात-पात कचरा ला, भूर्री देये बार गा।
बोले अमरित बानी, बबा हे अगमजानी, पैलगी डंडा-शरन, तोला बारम्बार गा।
रोम्हियाय बादर हे
लागथे गिराही पानी, रेरही खदर छानी,
रोम्हियाय बादर हे, देखौ तो असाड़ के।
भारी अँधियारत हे, पाँव ला पसारत हे,
घपटत हावै बड़, सँइता ला छाँड़ के।
धार हा अमाही नही, खपरा मा आही नही,
घरिया बिगाड़ दिही, बने कीर काँड़ के।
लावथे पवन धर, रोसहा झिपार बर,
दौहा बुताही लगथे, तन चाम हाड़ के।
- मनीराम साहू 'मितान'
बार हवै
बार हवै बार दे जी, प्रन ले ए बार तैं जी, आँट खोड़ इरखा ला, होरी मा तैं डार दे।
घतक्वार हे यें भारी, छोटे सोंच निदा चारी, पिका झन फोरै कोनो, जर खन मार दे।
शरन ये पाये हावैं, भीतर समाये हावैं, घात घन घरूहा ला, आजे तैं उजार दे।
हवैं जेन जग सार, गिन गिन मुड़ासार, दया-मया भाईचारा, लाके बइठार दे।
- मनीराम साहू मितान
मनहरन घनाक्षरी (बादर राज)
रदरद-रदरद, बरसय बद-बद, बादर पवन आये, बद के मितान जी।
झाँकत झिपार बड़, परछी ओसार खँड़, रोहो-पोहो चोरो-बोरो, चढ़ै सब थान जी।
खपरा दरर गेहे, खदर सिहर गेहे, काय करैं चूहत हें, हवैं परसान जी।
होके बदरा के बस, रेंगै रेला साँप अस, छबना ओदार करै, बड़ उदियान जी।
कहाँ इँन अँतरथे, कोनहा मा सँचरथे, लहुट-पहुट आय, पारे हवैं ढार जी।
पानी झिंकात नइहे, मोरा मा आत नइहे, ओरमे हे लरी कस, ओंरवाती धार जी।
किचिर-काचर बड़, गिदिर-गादर बड़, झार कोठा-कुरिया औ, अँगना कोठार जी।
होगे दसना मउला, जुड़जुड़ागे पउला, कोर्मुवागे चाँउर हा, सिलियागे दार जी।
धार खोलै खोर झार, खखोलत पार टार, मिल भेंट होगें घुर, मुरमी खदान जी।
तरियन गें अघाय, नरवा हे उम्हियाय, खँड़ भर नदिया हो, पोंसथे गुमान जी।
पानी पट ओढ़े खार, पँड़्री-पँड़्री दिखै नार, सुभा भर नहात हे, मुड़सुद्धा धान जी।
चलते बादर राज, थमे सब खेती काज, हलकानी हावे तभो, खुश हे 'मितान' जी।
- मनीराम साहू 'मितान'
प्रणाम
बुद्धि दाता ला प्रणाम, विद्या माता ला प्रणाम, गाँव मा बिराजे सबो, देव ला प्रणाम हे।
खोर-गली धुर्रा माटी, चंदन हे जेन खाँटी, पारा-पारा मँझ मुड़ा, छेंव ला प्रणाम हे।
आये हें सुजान कवि, ज्ञान के खदान कवि, काव्य के भाव आँकर, सेव ला प्रणाम हे।
बैठे सुनइया भारी, भैया दीदी महतारी, आयोजक कार्यक्रम, नेव ला प्रणाम हे।
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