कुंडलिया छन्द
1. मुन्डा मूड़
लगथे जी सिरतो हरू, चिकना मुन्डा मूड़ ।
तिपथे तुरते घाम मा, खोजय लउहे जूड़।
खोजय लउहे जूड़, छाँव ला अबड़े भाथे।
कमती लागय तेल, काम कंघी कहँ आथे।
कतको राहय भीड़, मूड़ दुरिहा ले झकथे।
होय कहूँ बरसात , नीक अबड़े के लगथे।
2. किसान
नाँगर धरके जात हे,देखव देव किसान।
आगे हवय असाड़ हा, बोये बर हे धान।
बोये बर हे धान, हाथ मा हवय तुतारी।
बिजहा बासी पेज, लेगही धर महतारी।
खँटही मोर 'मितान', पेरही दिन भर जाँगर।
उपजाये बर अन्न, जात हे धरके नाँगर।
3. नून
जबर भाग हे नून के, होगे हाबय खास।
रहिस जेन हा पाँच के, पागे भाव पचास।
पागे भाव पचास, मया एकर बर जुरगे।
घुरवा के दिन सच्च, देख लव आज बहुरगे।
पावत हाबय मान, मिलत तो इही खबर हे।
होगे दरजा ऊँच, नून के भाग जबर हे।
4.नोनी
1
नोनी मारे कोंख के,करथच बाबू जाप।
कतको करले तैं जतन, नइ उतरय जी पाप।
नइ उतरय जी पाप,नरक तैं सोज्झे जाबे।
हो जाबे तै नास,बहू नइ खोजे पाबे।
बिनती करय 'मितान',सफल कर मनखे जोनी।
बाँचय बन रखवार,मरय झन कोनो नोनी।
2
होथें नोनी जात जी,दुइ कुल तारन हार।
मइके-ससुरे जान सम,करथें बेंड़ा पार।
करथें बेंड़ा पार,सदा ले पूरा अोली।
बाँटयँ मया पिरीत,सबो के भरथें झोली।
देथें सुख संसार,दाग ला सबके धोथें।
भरथें घर परिवार,रूप लछनी के होंथें।
3
नोनी कोंवर हें भले,कमती झन तैं जान।
काहत हँव सिरतोन मैं,सोला आना मान।
सोला आना मान,बनत भर के बनवाली।
साहत हें तव ठीक,नही ते दुरगा काली।
फूँके मा उड़ जायँ,समझ झन कोनो पोनी।
पहुँचयँ उड़त अगास,हवयँ जी आगर नोनी।
-मनीराम साहू 'मितान'
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