धीर परसथे खीर जी, रोस परसथे घाव।
मया परसथे अउ मया, संगत ज्ञान सुभाव।
बोली बोलन हम बने, मन तखरी मा नाप।
करू चिरय हिरदे तुरत, मीठ तुरत दय काप।
ये दुनिया के जान लव, अलकर हे ब्यवहार।
खाथें बीही मीठ ला, चुपर चुपर के खार।
जतके हाबय हाथ मा, उहि मा लव आनंद।
कर देथे तिसना हमर, सुख के रस्ता बंद।
भला इही मा हे सखा, कहत हवँव कर जोड़।
कथरी लम्हरी हे जतिक, लमय ओतके गोड़।
बात सदा ले सार हे, जानत हे संसार।
बोंथे तेने हा लुथे, पछताथे गरियार।
जेकर मुड़ हे बोझहा, ओही पाथे जान।
देखइया के काय हे, बतियाथे बस तान।
जिनगी रहिते फर करम, मिलथे सिरतो आप।
जस रुख मा फर पा समे, आ जाथे चुपचाप।
चीज गजब जग हे खुशी, दुख पीरा के काट।
तोर करा नइ हे तभो, सकथच जी तैं बाँट।
मनीराम साहू 'मितान'
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