Wednesday, 25 December 2019

किसान मोद सवैया

किसान
(1)
खूब कमाय किसान सबो पर हासिल तो पीरा बस आथे।
बादर हा बरसै नइ जी बरसै जब वो बिक्टे बरसाथे।
जाय सुखाय बिना जल के सह या बरसा ले वो सर जाथे।
मौसम ठीक रहै त कभू चट कीट पतंगा हा कर जाथे।

(2)
छूटय गा नइ संग कभू करजा रइथे मूड़ी लदकाये।
ले उँन पावयँ तो नइ जी चिरहा पटकू ले काम चलायें।
लाँघन गा रहि जाय घलो उँन भाग म बासी पेज लिखाये।
पालनहार कहायँ भले उँन रोज गरीबी भोग पहायें।

(3)
घूमयँ जी उघरा लइका मन पाँव कहाँ जूता हर होथे।
आड़ किसानन ले बड़का मन स्वारथ रोटी ला बड़ पोथें।
ध्यान कहाँ रइथे ककरो सरकार घलो संसो बिन सोथे।
हार जथें बपुरा मन हा अउ जा तब फाँसी आप अरोथें।

छंदकार- मनीराम साहू 'मितान'
कचलोन (सिमगा )
जिला बलौदाबाजार भाटापारा
छत्तीसगढ़ 493101

Thursday, 5 December 2019

कुंडलिया (हिन्दी)

(1) पराली

धान पराली को सभी, चलो सहेजें  आज।
लायें  ढो खलिहान से, करें पुन्य का काज ।
करें पुन्य का काज, नही हम इसे जलायें।
दें पशु को आहार, डाल घुर इसे गलायें।
बनता बढ़िया खाद, नही पशु भोजन खाली।
होगा सबको लाभ, जले ना धान पराली ।

(2) स्वच्छता

हो घर बाहर स्वच्छता, बाँटे हम सन्देश।
सफल करें अभियान को, रहे स्वच्छ परिवेश।
रहे स्वच्छ परिवेश, लाभ को चलो गिनायें।
चलो बढ़ायें पाँव, सफाई करें दिखायें।
हों हम भागीदार, काज ये पावन सुन्दर ।
रहें  सभी खुशहाल,  स्वच्छता हो बाहर घर।

कुंडलिया छंद

नाम- मनीराम साहू 'मितान'
मोबा.- 9826154608
पता- म.नं.153, कर्मचारी कालोनी सिमगा
         जिला- बलौदाबाजार-भाटापारा
          छत्तीसगढ़ 493101

(1)मानवता

मानवता अब गुम हुई, नही कहीं संस्कार ।
बढ़ा हुआ व्यभिचार है, देखो इस संसार ।
देखो इस संसार, बेटियाँ जातीं मारी।
सम्मुख रक्षक खूब, लुटे हैं अस्मत नारी।
पाल रखे हैं पाप, सोच में है दानवता।
बैठे हैं सब मौन, आसनी है मानवता ।

(2) छाँया

छाँया को है ढूंढता, नही लगाया पेड़ ।
काट दिया निज स्वार्थ में, चला चाल तू भेंड़।
चला चाल तू भेंड़, देखना पछताओगे ।
फँस कर खुद की जाल,हार कर मर जाओगे।
किया उसी में छेद, थाल जिसमें तू खाया।
ऐ पातक इंसान, ढूँढता किस मुँह छाँया।

(3) प्याज

आलू बोले प्याज से, मत खा इतना भाव।
मुझको भाये हैं  किलो,तुझको आधा पाव।
तुझको आधा पाव, सदा मैं सब्जी राजा।
लगता हूँ स्वादिष्ट, नही तुझको अन्दाजा ।
खूब उचक हर बार, रुलाता है तू चालू।
देता सबको कष्ट, प्याज से बोले आलू।

(4) माँ बाप

माता लगती बोझ सी,फोकट बूढ़ा बाप।
तरसाते जल अन्न को, करते हैं ये पाप।
करते हैं  ये पाप, भूल बैठे हैं  निर्लज।
फिरें दिखाते शान, सभी जिम्मे को ये तज।
आएगा वो रोज, करेंगे न्याय विधाता।
कर्म करेंगे याद, बुढ़ापा में पितु माता।

(5) धुआँ

धुआँ-धुआँ सा बस दिखे, नभ में चारों ओर ।
शहर शहर अब गाँव में, इनके हैं बस जोर।
इनके हैं बस जोर, कौन अब रोके इनको।
नही किसी को फिक्र, बढाते देखो जिनको।
कहे मनी कर जोर, प्रदूषण मौत कुआँ है।
सुन लो सभी सुजान, जहर ये धूल धुआँ है।

(6) थैला

थैला रख लें साथ में, जायें  जब बाजार।
है सज्जन का काम ये, खुद पर है उपकार।
खुद पर है उपकार,  बुरी है झिल्ली पन्नी।
करे लाख नुकसान, नही है दाम चवन्नी।
नही घटेगा शान, काम ना है ये मैला।
जब भी लें सामान, रखें इक कपड़ा थैला।

Tuesday, 19 November 2019

सार छंद

सार छंद- मनीराम साहू मितान

सुनव सुनव जी सबो किसनहा, बइठव झन बन भैरा।
धनहा डोली खेतखार मा, बारव झन जी पैरा।

धुँगिया होथे फरी हवा मा, परदूषन हा बढ़थे।
एकर सेती भुँई ताव के, पारा हा बड़ चढ़थे।

संग साँस के तन मा जाथे, घात नँगत के करथे।
एती बर सब जीव जन्तु मन, फोकट फोकट मरथे।

जब सकेल के एला भइया, रखहू लेग बियारा।
भँइसा बइला गरू गाय के, बनही सुग्घर  चारा।

किंजरत रइथें एमन भइया, एती ओती देखव।
मर जाथें जी बिन चारा के, इन ला चिटिक सरेखव।

बाँधव घर मा सब झन पोंसव, चारा देव बरोबर।
सब ला मिलही दूध दही घी, खातू बर जी गोबर।

काम धरम के हावय एहा, करतब हे सब झन के।
सफल बनालव जिनगी ला जी, साँस मिले हे गन के।
    - मनीराम साहू 'मितान'


   मजा उड़ाबो(सार छंद)

सुखवा दुखवा चैतू बुद्धू , चलव चलावत गड्डी।
तरिया जाबो डुबक नहाबो, धर लव कुरता चड्डी।

उथली-उथली खेल छुवउला, करबो मिलके मस्ती।
अबड़ मिठाथे हवय पार मा, खाबो पिकरी गस्ती।

झुलबो जी हम बर्रइया मा, निहल-निहल हे डारा।
कुदबो चभरँग ले पानी मा, पारी पारी झारा।

नँगत खोखमा तरिया पैठू , हेर-हेर के खाबो।
हवय पार मा डुमर घलो जी, खाबो मजा उड़ाबो।

     मनीराम साहू 'मितान'

            

Saturday, 28 September 2019

हरिगीतिका छंद

दीया मया के (हरिगीतिका छंद)

दीया मया के बार ले,झन पोंस तैं अँधियार गा।
मन राख झन तैं खोड़ ला,सँग राख ले उजियार गा।
जग जीत गुरतुर बोल ले,जी ले बने तैं हाँस के।
करले रहत ले सत करम, नइहे ठिकाना साँस के।

ये तन भले दिखथे सुघर, माटी हवय तैं जान ले।
दिन एक पाके फर असन,ये गल जही तैं मान ले।
का के गरब अतका करे, नइहे कुछू जब तोर गा।
दिनरात रटथच तैं ह मैं, कइथच सबो ला मोर गा।

राखे हवस तैं जोर के,धन आय नइ कुछ काम गा।
परहित खरच सुख बाँट ले,रइही जगत मा नाम गा।
बनबे सहारा दीन के, होही सहारा राम हा।
तै रेंगबे सत बाट मा, हाँ मिल जही सुखधाम हा।

पाबे खुशी तैं  हेरबे, काँटा ल ककरो पाँव के।
आसीस चढ़ही मूड़ मा, करबे फिकर पर घाव के।
बड़ मीठ फर परमार्थ के, चिख देख ले तैं स्वाद गा।
दिन चार ये जिनगी हवय,झन कर समे बरबाद गा।

              मनीराम साहू 'मितान'
              कचलोन, सिमगा
              जिला- बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Tuesday, 30 July 2019

गंगा बारू

सखि छन्द

सुन ले गा गंगा बारू। छोड़ पिये बर तैं दारू।
तोर पिये के ये जोखा। कर देही तोला खोखा।

बेंच डरे हस बारी ला। हंडा हँउला थारी ला।
नइ बाँचिस गा बिजहा हा। धरवट लुगरा तिजहा हा।

दुख मा हें लइका बाई।बुढ़वा तोर ददा दाई।
चेत कहाँ  हाबय तोला। किंजरे जस मौनी भोला।

दिखथच भट्ठी जाते तैं।रइथच दिन भर माते तैं।
दिन हे अभी किसानी के। खातू माटी पानी के।

नाँगर रीता हे माढ़े। बइला हें ठलहा ठाढ़े।
ताकत हवय तुतारी हा।जोहय बाट कुदारी हा।

चूहत हाबय छानी हा।खुसरत हे घर पानी हा।
खपरा जम्मो  फूटे हे। काँड़ घलो हा टूटे हे।

परे हवय सुन पैरा गा। होगे हस का भैरा गा।
नइ तो बँधे झिपारी हे। ना कोनो तइयारी हे।

परदा बिना पलानी के। घर हे बिना सियानी के।
गुन इन बँचही कइसे जी।करबे तैं हा अइसे जी।

चरदिनिया जिनगानी के।रखले लाज मितानी के।
हर ले सब करलाई तैं। छोड़  नशा ला भाई तैं ।