Sunday, 24 September 2017

मितान के बिनती

😃मितान के बिनती😀

गनपति महराज हो काबर,
नइ होवव ककरो बर करू।
जइसने तुहँर ददा हे भोला,
तइसने तहूँ मन निच्चट सरू।

तुहँर भगत मन होगे हें उलम्मा,
तुमन थोरको नइ खिसियावव।
कलेचुप बइठे रइथव आसन म,
काबर तुमन नइ गुसियावव।

तुहँर नाव के आड़ म ओमन,
नंगतेच के पइसा बरारथे।
तुमन ल भुलवारथे लाड़ू म,
ओमन आनी-बानी के झाड़थे।

खरचा करही पचास रूपिया के,
लिखे के बेर एक ठन शून्य बढ़ाथे।
तुहँर ददा के नाव ले-ले के,
ओमन रहि-रहि चिलम चढ़ाथे।

संझा होथे तहाँ ले अद्धी पउव्वा,
जम्मो भगत एक जगा जुरथे।
तुमन ल जानबा हे धन नइये ते,
पंडाल के पाछु म कुकरा चुरथे।

फुहर गाना बजा के नाचथें
नइ लजावँय  एको  रत्ती।
कोनो भगत मन रमी खेलथें
कोनो मन खेलथें काट पत्ती।

'मितान' के बिनती हाबय प्रभू,
देतेव हो थोरुक  धियान।
सबके दुरगुन ल खरहार देतेव,
चलाके स्वच्छता अभियान।

     मनीराम साहू 'मितान'
      कचलोन(सिमगा)

अँग्रेजी के झगरा (हास्य वयंग्य)

जब मैं ट्रेनिंग ले के पहुंचेंव,

बोले बर अँग्रेजी के।

घर मा माढ़गे झगरा, 

देशी अउ बिदेशी।


कहाँ मैं अँग्रेजी सीखे,

पहुचेंव अपन दुवारी।

कहाँ अढ़ी अँगूठा छाप,

मोर सुवारी।


बाहिर ले चिल्लायेंव, 

अरे ओ टेटकी के मदर।

कहिथे भीतरी मा आ,

सब होगे हे गदर फदर।


डेहरी मा माढ़े बाहरी ला देख केहेंव,

वाट इस दीस।

कइथे रँधनी मा आ,

चल हरदी मिरचा पीस।


मैं केहेंव वो माई क्वीन,

बना तो टू कप टी।

कहिस मोलो कपटी काहथस,

तैं कपटी तोर दाई कप टी।


मैं केहेंव वो माई बाबू दाई,

वाट हुआ वाट हुआ।

कइथे येला का होगे वो,

नरियावथे हुवाँ हुवाँ।


मैं केहेव ओ माई गोसाइन,

तुम नइ अन्डर स्टैंड।

कइथे हाँ हाँ तोर तोर रात दिन,

मोटर स्टेंड।


तोर तो गोड़ उठे हे,

मोटर स्टेंड जाये बर।

ओला झाँके ओला ताके,

रँग रँग गोठियाये बर।


मन मा सोचेंव ये अँग्रेजी के झगरा,

बाढ़ही तइसे लागत हे।

सावन मा चिखला कस

मातही तइसे लागत हे।


अँग्रेजी ला छोड़ के मया करत कहेंव,

तोला का होगे बदरा।

मैं तो बने बने गोठियाथँव,

तैं मताथस झगरा।


चिचियाके कहिस,

तैं झगराहा तैं लड़न्का।

मैं सोच के चुप्पे होगेंव कि, 

ये तो महसंग्राम के बजादिस डंका।


अब ओकर मइन्ता जुड़ाइस,

सोंंचेंव फेर कुछ अजमाना चाही।

मोला चढ़े अग्रेजी के नसा

फेर अँग्रेजी मा गोठियाना चाही।


मैं केहेंव वो प्राण प्यारी माई वाइफ,

आई लाइक यू।

पिक्चर देख के उहू सीखगे राहय,

कहिस मोर राजा आई लव यू।


  - मनीराम साहू 'मितान'





 


झन मया कर (सामान्य)

1. अब वार कर

झन मया कर अब वार कर।
दुष्ट पापी मन के संघार कर।

देख डरे उँकर मितानी ल,
अब बईरी जस बेवहार कर।

जिहाँ फूल नही काँटच बाढ़य,
अइसन फुलवारी के उजार कर।

भूत ह बात म मानत नइये,
अब लाते-लात  परहार कर।

अँतस म मया मनुसता नइये,
अइसन छाती म बम बउछार कर।

होवय गरब दाई ल बेटा उपर,
अइसन बूता ल बार-बार कर।

                     मनीराम साहू 'मितान'

2. सरस्वती दाई (सुवा गीत)

तरी हरी नाना नाना सुवाना वो,  

तरी हरी नाना नाना सुवाना।


जोहर जोहर सरसती दाई वो,

जोहर जोहर सरसती दाई।

पँइया लागन तोरे हे माई वो,

पँइया लागन तोरे हे माई ।

              परही तोला लाजे बँचाना वो,

              तरी हरी नाना नाना सुवाना।

              

झोकि लेना दाई नरियर सुपारी वो,

झोकि लेना दाई नरियर सुपारी ।

अइ जबे हमरो अँगना  दुवारी वो,

अइ जबे हमरो अँगना दुवारी ।

             तोरे सहारा धरे हँन बाना वो,

             तरी हरी नाना नाना सुवाना।

           

अक्कल बुध के हाबन नदानी वो,

अक्कल बुध के हाबन नदानी।

तहीं हर दाई हाबच गियानी वो,

तहीं हर दाई हाबच गियानी।

             देइ जबे दाई बुधे खजाना वो,

             तरी हरी नाना नाना सुवाना।


तोर बिन कारज कोने सिधोही वो,

तोर बिन कारज कोने सिधोही।

मया दुलारे ला कोने पुरोही वो,

मया दुलारे ला कोने  पुरोही।

             गावत हाबन तोरे जस गाना वो,

             तरी हरी नाना नाना सुवाना।


       -मनीराम साहू 'मितान'

     

   3 भक्तिन करमा दाई (गीत)

भक्तिन करमा दाई, जन जन के तैं माई,

तेली कुल के तैं हर, ऊँचा नाम करे वो।


सम्वत एक हजार तिहत्तर, बगरिस वो उजियारी।

चैत माह के एकादस तिथि,पाख रहिस अँधियारी।

सुग्घर पावन झाँसी नगरी, राम शाह के घर मा।

जनम धरे तैं आये माता, नाम धराये करमा।

खुशी डोर कमला के , नँगते लाम करे वो

तेली कुल.......१


भाव भक्ति के अलख जगाये, तैं हा नान्हे पन मा।

करम तोर सब निक ले उज्जर,बस गेये जन मन मा।

पदम तोर पति तोर काम ला, चिटको नइ तो भाइस।

मूर्ति  लुका के अन्ते कोती, तोला वो अजमाइस।

भक्त बनाये उहला , अइसन काम करे वो

तेली कुल......२


कष्ट हरे तैं तेली जन के, तेल कुंड भरवाये।

राजा के हाथी के खजरी, दुरिहा तैं भगवाये।

हल्का होइस तोरे आगू , राजा अत्याचारी ।

तोर भक्ति के बल ला माता,जानिस दुनिया सारी।

जपन किसन के तैं हा, आठो याम करे वो

तेली कुल ......३


जगन्नाथ के दरसन खाती, पुरी धाम बढ़ गेये।

ऊँच नीच के भेद करिन तब, पंडन ले लड़ गेये।

तोर पुकार सुनिस भगवन हा, होइस सउँहे परगट।

खाइस खिचरी तोर हाथ ले, माँग माँग के झट झट।

भक्तिन मात कहाये, बस मा श्याम करे वो

तेली कुल.....४

  - मनीराम साहू 'मितान'


4. सात सारा के भाँटो (हास्य)


कोनो खँधइया कोनो पिठइया,

चढ़ बना देथें मोला आटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी,

मै हर सात सारा के भाँटो।


महिना पुट जी मोर सास हा,

बेटी ला देखे के ओखी आथे।

लाथे जम्मो झन ला धरके,

पन्दरा दिन ले रहि के जाथे।


जुरमिल चिचियाथें सारा मन,

कइथें भाँटो तेलई ला चाँटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी,

मैं हर सात सारा के भाँटो।


पूरय नही अबड़ कन लाथवँ,

झोला भर भर खऊ खजेना।

चीथो चीथो करथे सब झन,

कइथें महू ला देना देना।


खँगथे तहाँ ले हँसिया धरके,

करथें मोर मेछा काटो काटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी,

मैं हर सात सारा के भाँटो।


भात बासी हा हँड़िया के जी,

देखते देखत मा सिराथे।

कतको कन राँधय भर कराही,

साग पान घलो खँग जाथे।

 

कस के खाथें अउ बुता करथें,

जा के भाँठा परिया पाटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी,

मैं हर सात सारा के भाँटो।


खटिया दसना पूरय नही जी,

ओमन आगू ले पोगराथें।

पैरा दसा सुतथवँ परछी मा,

बड़ हाथ गोड़ मन खजवाथें।


कहिथवँ काँही सारा मन ला,

तहाँ बाई करथे डाँटो डाँटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी, 

मै हर सात सारा के भाँटो।

-मनीराम साहू 'मितान' 

5. खाले रे मनीराम

खाले रे मनीराम,
शक्कर मिठाई।
जी परमारथ बर,
तैं कर ले कमाई।

काबर बोजाथस तैं,
लालच के लद्दी म।
फंद जाबे फाँदा म,
बुड़बे नाम बद्दी म।
चरदिनिया जिनगी
कुछु कर ले भलाई।
खाले.................

टार के तो देख तैं
ककरो रद्दा के काँटा।
दुनिया म सुख के,
मिलही तोला बाँटा।
कर बूता जोरे के,
झन कर राईं-छाईं।
खाले.................

काकर बर सकेले,
धन,महल-अटारी।
बड़ करे बइमानी,
मारे  झूठ-लबारी।
जाबे हाँथ रीता तैं
नइ जय एको पाई।
खाले................

गोठिया ले गुरतुर,
मया  के भाखा।
छिन म जर जाही,
इरखा के पाखा।
धोले छक-छक ले,
तैं अंतस के काई।
खाले.............?

-मनीराम साहू मितान

6. करिया धन

करिया धन,  करिया धन,
नंगत परत हाबय गोहार।
एकर सेती बंद होगे हाबय,
नोट पाँच सौ अउ हजार।

ठउर-ठउर म होवत हाबय,
अड़बड़ आनी-बानी चरचा।
कोनो काहथे बनेच होइस,
कोनो कामा करिन खरचा।

एक जगा गोठियावत रहिन,
करिया धन सहर म होथे भइया।
गाँव वाले मन कहाँ के पाही,
तबहो देख माते हे करलइया।

पप्पू कहिस तुमन गलत काहथव,
सहर वाले मन कहाँ के पाही।
करिया धन तो गाँव म होथे,
भले कहि लव जी तुमन काँही।

बात परे बात निकलगे कहिस,
सुनव बतावत हँव मै भाई।
करिया धन नइ फुरय सबो ल,
मोला बताय रहिस ममादाई।

करिया धन हमरो घर हाबय,
लाय रहिन घर ले नाना के।
ये धन पुरखौती हे भइया,
डोकरी दाई-बबा जबाना के।

करिया धन म भरे हाबय,
हमर घर के जी जम्मो कोठा।
कोनो हाबय पातर-लिलहर,
कोनो हबय जी मोट्ठी-मोट्ठा।

करिया धन सोन चाँदी नोहय,
नोहय 'मितान' रूपिया-पइसा।
हमर  धन सिरतोन हे करिया,
जेला कइथन भँइसी-भँइसा।

      मनीराम साहू 'मितान'

@ लुगरा बर @


मुँह ला फुलोय हे फुग्गा कस,

अलकरहा रूप बनाय हे।

का दुख ला गोठियावँव संगी,

बाई लुगरा बर रिसाय हे।


कइथे काँही लेवस नही मोर बर,

रात दिन बुता मा घिलरत हँव।

जब ले बिहा के आय हवँव, 

मइकेच के लुगरा पहिरत हँव।

पानी पी पी लड़त रहिथे,

करत साँय साँय हे।

का दुख.......1


झन लड़य बिनिया ले कहिके,

येदे राम के नाम ला लेवत हँव।

तीन दिन होग राँधत नइहे,

महीच राँध के देवत हँव।

काम बुता कुछ करत नइहे,

मुहू ला ओथराय हे

का दुख.......2


छिटही लुगरा लाये रेहेंव,

बने दस आगर दस कोरी मा।

भँवा के ओला फेक दिस,

उतरगे तोरी मोरी मा।

चुनई के लुगरा लाय हस कहिके,

धमगजरा मड़ाय हे।

का दुख.......3


कइथे नइ लेवँव सस्ताहा,

सुन कंजूस घुचघुचहा।

मैं तो लेहू बनारसी लुगरा,

पाँच हजार के ऊँचहा।

सउँहे जाहूँ निमार के लेहूँ,

बजार जाय बर खोभियाय हे।

का दुख........4


भले कहिलव मेड़वा तुमन,

जइसे कइथे नाचत हँव।

करथँव घर के जम्मो बुता,

लुगरा पोलखा काँचत हँव।

उंकरे दरी सुधरबे कहिके,

अपन ददा भाई ला बलवाय 

हे।

का दुख .......5


  - मनीराम साहू 'मितान'

Friday, 22 September 2017

देश के खातिर

@@देश के खातिर@@

दू घंटा लाइन लगायेंव त,
लटपट पहुँचेवँ मशीन तीर।
अइसे लागिस जइसे मोला,
जंग जीतगेंव होगेंवँ बीर।

ए टी एम ले कड़कड़ावत,
निकलिस दू हजार के नोट।
कभू तो देखे नइ राहँव,
कुलकुलायेंवँ मैं हर पोठ।

दू हजार के नोट ल धरके,
पहिली पहुँचेंवँ जी हाट।
लेयेवँ दू किलो पताल,
लाल-लाल बढ़िया छाँट।

नोट मैं हर दे के केहेंवँ,
एले तीस काट ले महतारी।
सब्जी वाली खिसिया कहिस
मार झन तैं हुसियारी।

कइथे तीस रूपिया के ले बर,
देखाथच दू हजार के नोट।
मोर तो बक्का नइ फूटिस,
देखत  राहवँ   बोट-बोट।

कहिस रख दे तैं पताल ल,
लेड़गी समझे हस मोला।
चिल्हर कराय बर मही मिलेंवँ,
रेंग धरके अपन झोला।

आलू वाले घलो होगे,
मोर बर एकदम खार।
कहिस चिल्हर देखा लेले,
फेर आलू छाँट निमार।

धरे दू हजार के नोट ल,
गिजरेंवँ  जम्मो दुकान।
मोर झोला ह रीता रहिगे,
नइ मिलिच काँही सामान।

मैं केहेंवँ कोनो बात नइये,
'मितान' थोकन तैं दुख पाले।
देश के खातिर तहूँ चार दिन,
नून-चटनी म काम चलाले।

   मनीराम साहू'मितान'

अँग्रेजी के झगरा (हास्य वयंग्य)


जब मैं पहुंचेंव ट्रेनिंग ले के,

बोले बर अँग्रेजी के।

मोरे घर मा माढ़गे झगरा, 

देशी अउ बिदेशी।


कहाँ मैं अँग्रेजी सीखे,

पहुचेंव अपन दुवारी।

कहाँ अढ़ी अँगूठा छाप,

मोर सुवारी।


बाहिर ले चिल्लायेंव, 

अरे ओ टेटकी के मदर।

कहिथे भीतरी मा आ,

सब होगे हे गदर फदर।


डेहरी मा माढ़े बाहरी ला देख केहेंव,

वाट इस दीस।

कइथे रँधनी मा आ,

चल हरदी मिरचा पीस।


मैं केहेंव वो माई बाबू दाई,

क्या हुआ क्या हुआ।

कइथे येला का होगे वो,

नरियावथे हुवाँ हुवाँ।


मैं केहेव ओ माई गोसाइन,

तुम नइ अन्डर स्टैंड।

कइथे हाँ हाँ तोर तो रात दिन,

मोटर स्टेंड।


तोर तो गोड़ उठे हे,

मोटर स्टेंड जाये बर।

ओला झाँके ओला ताके,

रँग रँग गोठियाये बर।


मन मा सोचेंव ये अँग्रेजी के झगरा,

बाढ़ही तइसे लागत हे।

सावन मा चिखला कस

मातही तइसे लागत हे।


अँग्रेजी ला छोड़ के मया करत कहेंव,

तोला का होगे बदरा।

मैं तो बने बने गोठियाथँव,

तैं मताथस झगरा।


चिचियाके कहिस,

तैं झगराहा तैं लड़न्का।

मैं सोच के चुप्पे होगेंव कि, 

ये तो महसंग्राम के बजादिस डंका।


अब ओकर मइन्ता जुड़ाइस,

सोंंचेंव फेर कुछ अजमाना चाही।

मोला चढ़े अग्रेजी के नसा

फेर अँग्रेजी मा गोठियाना चाही।


मैं केहेंव वो प्राण प्यारी माई वाइफ,

आई लाइक यू।

पिक्चर देख के उहू सीखगे राहय,

कहिस आई लव यू।


  - मनीराम साहू 'मितान'


कुकुर मन के होरी


बड़े बिहनिया का देखेंव मोर पारा।

कुछ कुकुर आँवारा, कुछ शादीशुदा कुछ कुँवारा।

पीये पाये मस्त खाये भाँग गोली।

जुरिया के निकलिंन खेले बर होली।


कुतवंतिन भउजी ला रस्ता मा पालिंन।

होरी के ओखी मा मिलके गिंधियादिंन।

चिखला ला धरके बरपेली लगावँय।

जेला पावय तेला नँगते कूदावँय।

एक झन मनखे के घेंच ला दाबदिंन।

हाथ गोड़ पेट ला मिलके चाबदिंन।

अड़बड़ मनखे सकलागें, कोनो काहय बइगा घर लेगव कोनो मेकाहारा।

बड़े.......


ड्यूटी मा घूमत थानेदार आइस।

जोरसे चिचियाके जम्मो ला हड़काइस।

संतरी ला बला के हाथ गोड़ ला बाँधदिस।

गाड़ी मा भरके लेगगे, जेल मा धाँधदिस।

जम्मो ककुर मन के,  शुरू होगे हाँव हाँव।

थानेदार बर घलो, करिंन खाँव खाँव।

थानेदार हाय हाय मिलके लगाइँन नारा।

बड़े......


आगे तुरते थानेदार करा ऊपर ले फोन।

थानेदार कहिस बोलत हस कोन।

कहिस नेताजी बोलत हँव, झन कर परसान।

कारवाही करके अपन, झन कर तैं नसकान।

ये दारी के होली मा कानून ला तोड़ दे।

सामने चुनाव हे कुकुर मन ला छोड़ दे।

कहिस धर ले थइली मा केस के जम्मो धारा।

बड़े......

- मनीराम साहू 'मितान'



ताटंक छंद

ताटंक छंद

राखी

देखत होही रस्ता मोरे,
बिहना ले गड़िया आँखी।
दीदी घर मैं जाहूँ दाई,
बँधवा के आहूँ राखी।

बारा महिना होगे हाबय,
नइ देखेअँव ओला वो।
रहि-रहि के बड़ आवत रहिथे,
ओकर सुरता मोला वो।

सजा-धजा के राखे होही,
मिठई राखी ला थारी।
तरपँवरी खजवावत हाबय,
मोर करत होही चारी।

बने जोर दे रोटी-पीठा,
अरसा खुरमी सोंहारी।
खाहीं नँगते भाँची-भाँचा,
खुशओमन होहीं भारी।

भाँटो ला तो भाथे दाई,
गहूँ चना के होरा वो।
ओकर बर मैं लेके जाहूँ,
झटकुन करदे जोरा वो।

     मनीराम साहू 'मितान'

2. नारी

नइहे कोनो अबला अब गा, सबला जम्मो नारी हें।शारद लछमी दुरगा काली, शक्ति रूप अँवतारी हें।

कोनो नइहें पाछू संगी, चलयँ खाँध जोरे-जोरे।सबो काम मा रइथेंआगू, नइ सोंचयँ जादा थोरे।

लड़त हवयँ बइरी ले देखव, मेड़ो मा ताने सीना।करत हवयँ मिलके रखवारी, डरयँ नही मरना जीना।

उड़त हवयँ आगास देख लव, नँगत शक्ति हे नारी के।रँधनी ले अब बाहिर आके, गढ़यँ बाट बढ़वारी के।

नाम करत हें अपन देश के, ओमन पद बड़का पाये।

लगथे जेहा हवय असंभव, संभव करके देखाये।

मनीराम साहू 'मितान'

Wednesday, 13 September 2017

किरीट सवैया

किरीट सवैया

हे मधुसूदन हे बृज भूसन ले अँवतार ग ये जग आवव।
बाढ़त हे बड़ पाप इहाँ अब आवव हो पइती ल मड़ावव।
अंत करौ अति के सब माधव भक्तन के अब लाज बचावव।
दुष्टन ला सब मार गिरावव फेर ग धर्म धजा फहरावव।

संतन रूप बनाय ग देखव पाप के बाट धरे इँन हाबयँ।
देखवटी भगवान जपैं पुन दान करैं सब पाप ल छाबयँ।
नाव ल राम रहीम धरैं धन के बल कोड़ नियाव ल दाबयँ।
आवव केशव चाक गदा धर ये मन मानवता ल ग चाबयँ।

दानव गें बन मानव देखव मारय काटयँ बैर ग ठानयँ।
प्रीत मया इँन गा नइ जानयँ थोरुक मा लवठी धर लानयँ।
नीयत मा अब खोंट समा गय माँ बहिनी के नता नइ मानयँ।
आवव हो अब आव सुधारव नीत नियाव कभू नइ जानयँ।

   मनीराम साहू 'मितान'

दोहा छंद

1)छत्तीसगढ़ महतारी सिंगार
  ================

महतारी छत्तीसगढ़,बंदन हे जाेहार।
पर के तोरे पाँव ला,बरनत हँव सिंगार।

लुगरा हरियर तोर हे,हवय पोलखा लाल।
करिया करिया हे दिखत,कोरे गाँथे बाल।

सुग्घर खोपा तोर वो,गजरा हवस लगाय।
फूल केकती मोंगरा,अड़बड़ के ममहाय।

लुकलुक ले फुल्ली दिखय, फबथे टिकली तोर।
काजर ला आँजे हवस,तैं आँखी के कोर।

मुँहरंगी हाबय लगे,दिखथे सुग्घर ओंठ।
गुरतुर-गुरतुर लागथे,दाई तोरे गोठ।

चमकत हाबय सोनहा, खिनवा बारी कान।
महर-महर ममहात हे,खोंचे दवना पान।

चकचक ले रुपिया दिखय,गर मा सूँता तोर।
सुर्रा तोला बड़ फबय,गूँथे रेशम डोर।

हवय गोदना बाँह मा,पहुँची बहुटा भाय।
चूरी हाबय लाल वो,अँइठी पटा सजाय।

पहिरे मुँदरी नग जड़े,नख मा पालिस लाल।
नव लर करधन तोर वो, दिखथे नँगत कमाल।

टौंड़ा पैरी तोर वो,सबके मन ला भाय।
बाँटे मया दुलार तै,रेंगत फिरत बजाय।

लाली माहुर पाँव मा,चुक ले बिछिया तोर।
रहि जाथवँ देखत चरन, चलथस जब तैं खोर।

2)घरधुन्दिया
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सुरता नन पन खेल के, आथे संगी मोर।
खेलन हम घरघुन्दिया, कुधरइला मा खोर।

कोनो हा लइका बनय, कोनो बनय सियान।
खेलन हम जुरमिल रहन, संगी सबो मितान।

ठट्ठा-ठट्ठा राँध के,पिकरी ला बड़ खान।
सुँतई के बरतन रहय, तारा पीपर पान।

बोइर मोकइया रखे,खोलन हमन दुकान।
पथरा के सिक्का बना,लेवन जी सामान।

फरिया बाँधन मोटरा,पहुना बन के जान।
चुकिया मा पानी मिलय, होवय जी बड़ मान।

साँटी पहिरन साध मा,बमरी फर ला लान।
आवय जी अड़बड़ मजा, गावन जय गंगान।

टूटे टीपा ला बजा,जावन हमन बरात।
नाचन राउत नाच मा, दोहा पारन घात।

3)छत्तीसगढ़ के खेल
=============

नेती भँवरा नेत के, देवन हमन चलाय।
करय भुन्न के बड़ बजय,घूमय जी रठ खाय।

गिल्ली अउ डंडा धरन, खेलन जा दइहान।
उदकय गिल्ली टिन्ग ले,मारन टोंड़ा तान।

गली खोर मा साँझ के,खेलन अड़बड़ सूर।
ददा कहय तुम जाव झन, एती ओती दूर।

लीम तरी मा झार गा, नोनी मन सकलायँ।
फुगड़ी मातय रोज के, दे बछरू सब गायँ।

चिखला माटी खेल गा, बंगाला हा आय।
बाजय फूट फटाक  ले, अड़बड़ मन ला भाय।

रमटोही देवय अबड़, फल्ली मा सुकलाल।
काहय दल्लू दाम दे,बाँचे हाबय पाल।

गड़ी बदन खेलन सबो,छोटे बड़े मिझार।
खो खो दय नँगते मजा,होय जीत या हार।

डंडा पचरंगा अबड़,खेलन चेत लगाय।
उतरन जब हम पेड़ ले,चूहन मजा बताय।

खेलन बाँटी बर तरी, मिलके सबो मितान।
मजा अबड़ के आय जी, खेलन जा दइहान।

दस्सा पंजा खेल मा,मजा अबड़ के आय।
खेलन पीपर के तरी,जम्मो झन सकलाय।

दँउड़ दँउड़  के बड़ छुवन,खेलन नदी पहाड़।
कूद बितंगी खेल मा,झट ले होवन ठाड़।

खेलन चंदा रात मा,बिस अमरित के खेल।
छुकछुक छुकछुक कर चलय, हमरो गाड़ी रेल।

गोंटाअउ भटकउल मा,दँते रहन हम झार।
गारी देवय जब बबा, खेलन तरिया पार।

गरमी के दिन घाम मा,तीपय सबके मूँड़।
फल्ली बिल्लस छोड़ के, खेलन तरिया बूड़।

             मनीराम साहू 'मितान'