Sunday, 24 September 2017

झन मया कर (सामान्य)

1. अब वार कर

झन मया कर अब वार कर।
दुष्ट पापी मन के संघार कर।

देख डरे उँकर मितानी ल,
अब बईरी जस बेवहार कर।

जिहाँ फूल नही काँटच बाढ़य,
अइसन फुलवारी के उजार कर।

भूत ह बात म मानत नइये,
अब लाते-लात  परहार कर।

अँतस म मया मनुसता नइये,
अइसन छाती म बम बउछार कर।

होवय गरब दाई ल बेटा उपर,
अइसन बूता ल बार-बार कर।

                     मनीराम साहू 'मितान'

2. सरस्वती दाई (सुवा गीत)

तरी हरी नाना नाना सुवाना वो,  

तरी हरी नाना नाना सुवाना।


जोहर जोहर सरसती दाई वो,

जोहर जोहर सरसती दाई।

पँइया लागन तोरे हे माई वो,

पँइया लागन तोरे हे माई ।

              परही तोला लाजे बँचाना वो,

              तरी हरी नाना नाना सुवाना।

              

झोकि लेना दाई नरियर सुपारी वो,

झोकि लेना दाई नरियर सुपारी ।

अइ जबे हमरो अँगना  दुवारी वो,

अइ जबे हमरो अँगना दुवारी ।

             तोरे सहारा धरे हँन बाना वो,

             तरी हरी नाना नाना सुवाना।

           

अक्कल बुध के हाबन नदानी वो,

अक्कल बुध के हाबन नदानी।

तहीं हर दाई हाबच गियानी वो,

तहीं हर दाई हाबच गियानी।

             देइ जबे दाई बुधे खजाना वो,

             तरी हरी नाना नाना सुवाना।


तोर बिन कारज कोने सिधोही वो,

तोर बिन कारज कोने सिधोही।

मया दुलारे ला कोने पुरोही वो,

मया दुलारे ला कोने  पुरोही।

             गावत हाबन तोरे जस गाना वो,

             तरी हरी नाना नाना सुवाना।


       -मनीराम साहू 'मितान'

     

   3 भक्तिन करमा दाई (गीत)

भक्तिन करमा दाई, जन जन के तैं माई,

तेली कुल के तैं हर, ऊँचा नाम करे वो।


सम्वत एक हजार तिहत्तर, बगरिस वो उजियारी।

चैत माह के एकादस तिथि,पाख रहिस अँधियारी।

सुग्घर पावन झाँसी नगरी, राम शाह के घर मा।

जनम धरे तैं आये माता, नाम धराये करमा।

खुशी डोर कमला के , नँगते लाम करे वो

तेली कुल.......१


भाव भक्ति के अलख जगाये, तैं हा नान्हे पन मा।

करम तोर सब निक ले उज्जर,बस गेये जन मन मा।

पदम तोर पति तोर काम ला, चिटको नइ तो भाइस।

मूर्ति  लुका के अन्ते कोती, तोला वो अजमाइस।

भक्त बनाये उहला , अइसन काम करे वो

तेली कुल......२


कष्ट हरे तैं तेली जन के, तेल कुंड भरवाये।

राजा के हाथी के खजरी, दुरिहा तैं भगवाये।

हल्का होइस तोरे आगू , राजा अत्याचारी ।

तोर भक्ति के बल ला माता,जानिस दुनिया सारी।

जपन किसन के तैं हा, आठो याम करे वो

तेली कुल ......३


जगन्नाथ के दरसन खाती, पुरी धाम बढ़ गेये।

ऊँच नीच के भेद करिन तब, पंडन ले लड़ गेये।

तोर पुकार सुनिस भगवन हा, होइस सउँहे परगट।

खाइस खिचरी तोर हाथ ले, माँग माँग के झट झट।

भक्तिन मात कहाये, बस मा श्याम करे वो

तेली कुल.....४

  - मनीराम साहू 'मितान'


4. सात सारा के भाँटो (हास्य)


कोनो खँधइया कोनो पिठइया,

चढ़ बना देथें मोला आटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी,

मै हर सात सारा के भाँटो।


महिना पुट जी मोर सास हा,

बेटी ला देखे के ओखी आथे।

लाथे जम्मो झन ला धरके,

पन्दरा दिन ले रहि के जाथे।


जुरमिल चिचियाथें सारा मन,

कइथें भाँटो तेलई ला चाँटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी,

मैं हर सात सारा के भाँटो।


पूरय नही अबड़ कन लाथवँ,

झोला भर भर खऊ खजेना।

चीथो चीथो करथे सब झन,

कइथें महू ला देना देना।


खँगथे तहाँ ले हँसिया धरके,

करथें मोर मेछा काटो काटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी,

मैं हर सात सारा के भाँटो।


भात बासी हा हँड़िया के जी,

देखते देखत मा सिराथे।

कतको कन राँधय भर कराही,

साग पान घलो खँग जाथे।

 

कस के खाथें अउ बुता करथें,

जा के भाँठा परिया पाटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी,

मैं हर सात सारा के भाँटो।


खटिया दसना पूरय नही जी,

ओमन आगू ले पोगराथें।

पैरा दसा सुतथवँ परछी मा,

बड़ हाथ गोड़ मन खजवाथें।


कहिथवँ काँही सारा मन ला,

तहाँ बाई करथे डाँटो डाँटो।

का दुख ला गोठियाववँ संगी, 

मै हर सात सारा के भाँटो।

-मनीराम साहू 'मितान' 

5. खाले रे मनीराम

खाले रे मनीराम,
शक्कर मिठाई।
जी परमारथ बर,
तैं कर ले कमाई।

काबर बोजाथस तैं,
लालच के लद्दी म।
फंद जाबे फाँदा म,
बुड़बे नाम बद्दी म।
चरदिनिया जिनगी
कुछु कर ले भलाई।
खाले.................

टार के तो देख तैं
ककरो रद्दा के काँटा।
दुनिया म सुख के,
मिलही तोला बाँटा।
कर बूता जोरे के,
झन कर राईं-छाईं।
खाले.................

काकर बर सकेले,
धन,महल-अटारी।
बड़ करे बइमानी,
मारे  झूठ-लबारी।
जाबे हाँथ रीता तैं
नइ जय एको पाई।
खाले................

गोठिया ले गुरतुर,
मया  के भाखा।
छिन म जर जाही,
इरखा के पाखा।
धोले छक-छक ले,
तैं अंतस के काई।
खाले.............?

-मनीराम साहू मितान

6. करिया धन

करिया धन,  करिया धन,
नंगत परत हाबय गोहार।
एकर सेती बंद होगे हाबय,
नोट पाँच सौ अउ हजार।

ठउर-ठउर म होवत हाबय,
अड़बड़ आनी-बानी चरचा।
कोनो काहथे बनेच होइस,
कोनो कामा करिन खरचा।

एक जगा गोठियावत रहिन,
करिया धन सहर म होथे भइया।
गाँव वाले मन कहाँ के पाही,
तबहो देख माते हे करलइया।

पप्पू कहिस तुमन गलत काहथव,
सहर वाले मन कहाँ के पाही।
करिया धन तो गाँव म होथे,
भले कहि लव जी तुमन काँही।

बात परे बात निकलगे कहिस,
सुनव बतावत हँव मै भाई।
करिया धन नइ फुरय सबो ल,
मोला बताय रहिस ममादाई।

करिया धन हमरो घर हाबय,
लाय रहिन घर ले नाना के।
ये धन पुरखौती हे भइया,
डोकरी दाई-बबा जबाना के।

करिया धन म भरे हाबय,
हमर घर के जी जम्मो कोठा।
कोनो हाबय पातर-लिलहर,
कोनो हबय जी मोट्ठी-मोट्ठा।

करिया धन सोन चाँदी नोहय,
नोहय 'मितान' रूपिया-पइसा।
हमर  धन सिरतोन हे करिया,
जेला कइथन भँइसी-भँइसा।

      मनीराम साहू 'मितान'

@ लुगरा बर @


मुँह ला फुलोय हे फुग्गा कस,

अलकरहा रूप बनाय हे।

का दुख ला गोठियावँव संगी,

बाई लुगरा बर रिसाय हे।


कइथे काँही लेवस नही मोर बर,

रात दिन बुता मा घिलरत हँव।

जब ले बिहा के आय हवँव, 

मइकेच के लुगरा पहिरत हँव।

पानी पी पी लड़त रहिथे,

करत साँय साँय हे।

का दुख.......1


झन लड़य बिनिया ले कहिके,

येदे राम के नाम ला लेवत हँव।

तीन दिन होग राँधत नइहे,

महीच राँध के देवत हँव।

काम बुता कुछ करत नइहे,

मुहू ला ओथराय हे

का दुख.......2


छिटही लुगरा लाये रेहेंव,

बने दस आगर दस कोरी मा।

भँवा के ओला फेक दिस,

उतरगे तोरी मोरी मा।

चुनई के लुगरा लाय हस कहिके,

धमगजरा मड़ाय हे।

का दुख.......3


कइथे नइ लेवँव सस्ताहा,

सुन कंजूस घुचघुचहा।

मैं तो लेहू बनारसी लुगरा,

पाँच हजार के ऊँचहा।

सउँहे जाहूँ निमार के लेहूँ,

बजार जाय बर खोभियाय हे।

का दुख........4


भले कहिलव मेड़वा तुमन,

जइसे कइथे नाचत हँव।

करथँव घर के जम्मो बुता,

लुगरा पोलखा काँचत हँव।

उंकरे दरी सुधरबे कहिके,

अपन ददा भाई ला बलवाय 

हे।

का दुख .......5


  - मनीराम साहू 'मितान'

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