Friday, 22 September 2017

ताटंक छंद

ताटंक छंद

राखी

देखत होही रस्ता मोरे,
बिहना ले गड़िया आँखी।
दीदी घर मैं जाहूँ दाई,
बँधवा के आहूँ राखी।

बारा महिना होगे हाबय,
नइ देखेअँव ओला वो।
रहि-रहि के बड़ आवत रहिथे,
ओकर सुरता मोला वो।

सजा-धजा के राखे होही,
मिठई राखी ला थारी।
तरपँवरी खजवावत हाबय,
मोर करत होही चारी।

बने जोर दे रोटी-पीठा,
अरसा खुरमी सोंहारी।
खाहीं नँगते भाँची-भाँचा,
खुशओमन होहीं भारी।

भाँटो ला तो भाथे दाई,
गहूँ चना के होरा वो।
ओकर बर मैं लेके जाहूँ,
झटकुन करदे जोरा वो।

     मनीराम साहू 'मितान'

2. नारी

नइहे कोनो अबला अब गा, सबला जम्मो नारी हें।शारद लछमी दुरगा काली, शक्ति रूप अँवतारी हें।

कोनो नइहें पाछू संगी, चलयँ खाँध जोरे-जोरे।सबो काम मा रइथेंआगू, नइ सोंचयँ जादा थोरे।

लड़त हवयँ बइरी ले देखव, मेड़ो मा ताने सीना।करत हवयँ मिलके रखवारी, डरयँ नही मरना जीना।

उड़त हवयँ आगास देख लव, नँगत शक्ति हे नारी के।रँधनी ले अब बाहिर आके, गढ़यँ बाट बढ़वारी के।

नाम करत हें अपन देश के, ओमन पद बड़का पाये।

लगथे जेहा हवय असंभव, संभव करके देखाये।

मनीराम साहू 'मितान'

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